बचपन | Bachpan

वो बचपन की स्वर्णिम सौभाग्य,
रिश्तों का खज़ाना था।

वो परियो की कहानी थी
लड़कपन वो सुहाना था ।

उमंगे हर एक नजरों में,
सच करने का ज़माना था।

हजारों बंदिशें थी फिर भी,
मन का उन्मुक्त गाना था।

हजारों नाव बारिश में,
जहाज़ों का उड़ाना था।

भले वो महलें मिट्टी की,
सच्चाई का ज़माना था।

ना उर में उर्वर्शी की याद,
ना दिल का धड़कना था।

कभी यूं राह चलते चलते,
बस दिल तितलियों का दिवाना था।

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